प्रतिदिन प्रात काल मैं जल्दी उठकर सूर्य उदय से पहले स्नान करके ! स्वच्छ पवित्र स्थान में आसन बिछाकर पूर्व मुख्य होकर पदआसन या सुखासन मैं बैठ जाओ ! शांत प्रसन्न वृत्ति धारण करो ! मन मैं कठोर भावना करो कि मैं प्रकृति निर्मित इस सूक्ष्म शरीर के सब अभावों को पार करके, सब मैं दुर्बलता आदि छुड़ाकर आत्म-महिमा मैं जाकर ही रहूंगा आंखें आधी खुली आदि बंद रखो फिर फेफड़ों को खूब स्वास भरो और भावना करो कि स्वास के साथ मैं सूर्य का दिव्य आज भीतर भर रहा हूं स्वास को यथाशक्ति अंदर टकराए रखो फिर ओम....का लंबा उच्चारण करते हुए स्वास को धीरे धीरे छोड़ते जाओ स्वास खाली होने के बाद तुरंत स्वास ना ले ! यथाशक्ति बिनाा स्वास रहे और भीतर ही भीतर हरि ओम हरि ओम का मानसिक जप करो फिर से फेफड़ों में खूब समाज भरो और पूर्व कर प्रीति से यथा शक्ति अंदर टकराकर बाद में धीरे-धीरे छोड़ते हुए जिस हरि की शरण जाने से पाप ताप हो जाता है ऐसे पावन हरि ओम मंत्र का गुजन करो करके मन करके शांत शांत हो जाओ अब प्रयास छोड़ दो व्यक्तियों को आकाश की ओर फैला दो!
आकाश के अंदर पृथ्वी पर अनेक देश अनेक समुद्र एवं अनेक लोग हैं उनमें से उनमें एक तुम्हारा शरीर आसन पर बैठा हुआ है इससे पूर्व दृश्य को मानसिक आंख से भावना से देखते रहे आप शरीर नहीं हो बल्कि अनेक शरीर देश सागर पृथ्वी ग्रह नक्षत्र सूर्य चंद्रमा एवं पूरे ब्रम्हांड के देश दृष्टि हो साक्षी हो सक्षीभाव में जगह थोड़ी देर के बाद फिर से प्रणाम सहित हरिओम का जाप करो और शांत होकर अपने विचारों को देखते रहो
इस अवस्था में दृढ़ निश्चय करो कि मैं जैसा होना चाहता हूं वैसा ही हो कर रहूंगा नर नहीं नारायण विषय सुख सत्ता धन दौलत इत्यादि की इच्छा ना करो क्योंकि आत्मबल रूपी हाथी के पश्चिम में और सभी पश्चिम समाविष्ट हो जाएगी आनंद आत्मानंद सूर्य के उदय होने के बाद मिट्टी के तेल के दीए के प्रकार रूद्र गुलामी कौन करें?
कोई भी भावना को साकार करने के लिए हृदय में कुरेद डालो ऐसी फोर्स और बलिष्ठ आवश्यक है
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